भारतीय संस्कृति की धरोहर, मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में एक उज्जयिनी, महाकाल की उपस्थिति से अत्यन्त पावन, महिमा मण्डित, विक्रम के शौर्य-पराक्रम से दिग्-दिगन्त में देदीप्यमान और कवि कुलगुरु कालिदास के काव्यलोक से सम्पूर्ण विश्व में गौरवान्वित नगरी है। स्कन्दपुराण में इसको ’प्रतिकल्पा’ के नाम से सम्बोधित किया है, जो सृष्टि के आरम्भ में उसकी उत्पत्ति का प्रतीक है। वेदों एवं उपनिषदों में भी उज्जयिनी का धार्मिक दृष्टि से सब जगह वर्णन किया गया है।

महाभारत काल में भारतवर्ष जब सौरव्य व उत्कर्ष के शिखर पर पहुँच चुका था। उस समय भी उज्जयिनी  का महत्व बहुत बढ़ा हुआ था और उज्जयिनी में एक प्रसिद्ध विद्यापीठ विद्यमान था। उज्जयिनी का वर्णन प्राचीन वाङ्मय के कवि और लेखकों की रचनाओं में भी पाया जाता है जैसे- कालिदास, बाण, व्यास, शूद्रक, भवभूति, विल्हण, अमरसिंह, परिगुप्त आदि। उज्जयिनी के धार्मिक पवित्रता का महत्व प्राप्त होने के निम्न विशेष कारण हैं। इसी तरह मोक्ष देने वाली सप्तपुरियों में से उज्जैन प्रमुख है।

 श्मशान ऊर्वर क्षेत्रं पीठं तु वनमेव च।
पञ्चैके न लभ्यंते महाकाल बनाद्रते।।

अर्थात् उज्जैन  में (1) श्मशान , यानी भगवान् के रमण करने की जगह (2) उर्वर, यानी जहाँ मृत्यु होने पर मोक्ष मिलता है। (3) क्षेत्र अर्थात् जहॉ सबपापों का विनाश होता है। (4) जहॉ ’पीठ’ है मतलब हरसिद्धि जी व अन्य मातृकाओं का स्थान है। (5)  जहाँ महाकाल का निवास स्थान है, ऐसी पाँच महान बातों का योग पृथ्वी पर सिवाय उज्जैन के और कहीं नहीं है। अतः पुष्करराज आदि जितने तीर्थ इस पृथ्वी पर हैं वे सब तीर्थ महाकाल वन अर्थात् अवन्तिकापुरी में विद्यमान हैं। कई लाख वर्ष काशीवास करने से जो फल मिलता है। वह फल वैशाख मास में मात्र पाँच दिन अवन्तिका में वास करने से मिलता है।

प्राचीन काल से मालवा का ऐतिहासिक, भौगोलिक, आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण स्थान रहा है।मालवा उन हिन्दू  साम्राज्यों की समर भूमि रही है जिसके वीरतापूर्ण कार्यों से भारतीय इतिहास के अनेक पृष्ठ स्वर्णाक्षरों से सुसज्जित हैं। उनमें गर्व, गौरव, समृद्धि एवं महानता के कई उतार-चढ़ाव देखें। मालवा पर प्रारम्भ से ही प्रकृति की अपार कृपा रही है। लेकिन इतिहास एवं भाग्य का उस पर सदैव प्रकोप रहा है। अतएव अब वह सदियों से कई आक्रमणों के थपेड़ों को सहकर शान्ति एवं अपार वैभव के नये युग के द्वार पर खड़ा है।

विंध्याचल एवं सतपुड़ा की श्रेणियों से आच्छादित यह मालवा प्रांत भारतीय इतिहास के पृष्ठों में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है कालान्तर में इन पर्वत श्रेणियों के मध्य से दक्षिण को जाने वाले मार्ग मुग़लों ने बना दिये थे, आज भी दक्षिण से उत्तर और उत्तर से दक्षिण को जाने के लिए रेल पथ इन्हीं के मध्य से होकर गुजरता है। इन मार्गों पर प्राचीन काल के जो दुर्ग बने हैं, वे दक्षिण के प्रवेश द्वार कहलाते हैं। इनमें माण्डू, धार एवं असीरगढ़ के दुर्ग थे।

दिल्ली के सुलतान एवं सम्राटों की प्रारंभ से यही नीति रही कि सर्वप्रथम मालवा पर पूर्ण आधिपत्य स्थापित किया जायें ; जिससे दक्षिण में सेना, कुमुद, रसद आदि सामग्री पहुँचाने में आसानी होगी। क्योंकि दक्षिण पहुँचने का एक मात्र सुगम मार्ग मालवा से होकर ही जाता था। इसके अतिरिक्त मालवा की भूमि, उपजाऊ, उर्वरक एवं समशीतोष्ण जलवायु वाली है तथा यहाँ जीविकोपार्जन के साधन सरल एवं सुगम हैं।

उपर्युक्त कारणों से केन्द्रीय मुगल शक्ति और मराठा आक्रमणकारियों ने मालवा को अपने-अपने अधिकार में रखने और यहीं से अपनी सैन्य शक्ति और सत्ता का प्रचार-प्रसार किया तथा आगे चलकर इसी नीति का अनुसरण मराठों ने भी किया और मालवा पर अपना अधिकार जमाकर यहीं से उत्तर भारत में अपनी सत्ता स्थापित करना प्रारम्भ की।

मालवा भूमि इतिहास में अति प्राचीनकाल से प्रसिद्धि रही है। उसकी प्रसिद्धि का एक और कारण यह था कि उसने संसार को सभ्यता का पाठ पढ़ाने का गौरव प्राप्त किया है। आर्यावर्त तथा दक्षिण भारत को जोड़ने वाले मालवा प्रदेश को इस देश के कुछ अद्वितीय स्थानों को सुरक्षित रखने का गौरव भी प्राप्त है।